एक अनोखा बंधन

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अविनाश को ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली थी। इसलिए हम शादी में सिर्फ दो दिन पहले ही पहुंचे। ऑटो से उतरते ही कई जोड़ी आंखें हमारी ओर उठ गईं । उन आंखों ने हमें, खासकर मुझे देखकर आपस में खुसर-फुसर शुरु कर दी। अविनाश जब सामने से आते हुए वृद्ध दंपत्ति के पैर छुने के लिए झुके तो मैं समझ गई कि वही वंदना के नाना-नानी हैं। मैंने भी झुककर प्रणाम किया तो वे सकपका गए। उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मैं इस शादी में आऊंगी, पर मैं समझ सकती थी कि वंदन को देखने के लिए उनकी आंखें तरस रही थी। तभी तो वंदन को पल भर भी मेरी गोद में रहने न दिया। मम्मी तो वंदन को गले लगा रोए जा रही थीं।
बस के लंबे सफर के कारण बहुत थकान लग रही थी। धीरज हमारा सामान स्वयं उठाकर अविनाश को ऊपर वाले कमरे में ले गया। अविनाश तो चले गए, पर मैं अकेली रह गई। सब लोग वंदन को खिलाने कम और वंदना से उसकी तुलना करने में ज्यादा व्यस्त थे। मैं एक कोने में चुपचाप खड़ी थी। पापा ने शायद मेरी स्थिति भांप ली। इसलिए मेरे पास आकर बोले, अविनाश और कमरा ऊपर हैं। थक गई होगी। ऊपर जाकर जरा कमर सीधी कर लो। पर वंदन! वो वो भी थका हुआ है और भूखा है। मैं इसे साथ ले जाऊं। सवाल पूछते हुए मैं डर रही थी। कुल जमा दो दिन के लिए तो आया है, हमारा नाती। फिर तो हमेशा तुम्हारे पास ही रहेगा। जरा दो घड़ी जी भर के देख लेने दो, मम्मी ने पीछे से आकर कहा तो मैं चुपचाप सीढ़ियां चढ़ने लगी।
कमरे में गई तो अविनाश कपड़े बदलकर लेटे हुए थे। आंखें बंद थी, इसलिए समझ नहीं आ रहा था। सो गए हैं या सिर्फ आंखें बंद करके थकान मिटा रहे हैं। समझती भी कैसे। शादी के बाद से हमारे बीच एक दीवार सी खिंची हुई है। मैं जितना इसे तोड़ने की कोशिश करती हूं, ये उतनी ही ऊंची हो जाती है। मैंने धीरे से अटैची खोली। कपड़े लेकर बाथरुम में घुस गई। नहाने के बाद काफी फ्रेश लग रही था। थकान मिटाने के उद्देश्य से मैं भी अविनाश की बगल में जाकर लेट गई। मैंने आंखें बंद कर ली।
मुझे आज भी वह दिन अच्छे से याद हैं। जब अविनाश का रिश्ता मेरे लिए आया तो मेरे कुंआरे मन द्वारा संजोये सारे सपने बिखर कर रह गए, पर अपने शराबी पिता की स्थिति और सौतेली मां के दबाव के चलते एक बच्चे के बाप अविनाश से विवाह करने को तैयार हो गई। मेरी सहेलियों को जैसे ही मेरी सगाई का पता चला, बधाई देने चली आई। शर्म के मारे मैंने उन्हें वंदन के बारे में नहीं बताया, लेकिन अपनी सबसे करीबी सहेली नीलम के सामने दिल का दर्द आंसुओं के रास्ते बाहर आ गया।
देख अनु ! मैं जानती हैं, तू इस शादी से खुश नहीं है, लेकिन मैं ये भी दावे के साथ कह सकती हूं कि तू अपने स्वभाव के बूते पर सबका दिल जीत लेगी। उस घर की हर चीज़ में वंदना की आत्मा बसी है, इसलिए उसे मिटाने की कोशिश भूल कर भी नहीं करना, बल्कि अपने स्वभाव की खुशबू से उसकी आत्मा को जिंदा रखने का प्रयास करना। नीलम के कहे शब्दों को याद रखकर और मायके की कड़वी यादों को भुलाकर मैं रात्रि में फूलों के सेज पर बैठी अविनाश का इंतजार कर रही थी, तब बड़ी ननद से वंदन संभाले नहीं संभल रहा था। मैंने वंदन को अपने पास सुला लिया। अनु! मैंने तुमसे विवाह सिर्फ वंदन के कारण किया है। वंदन की मां, अगर वह भी तुम बन सकी तो, जिसकी हैसियत रखती हो। इसके अलावा मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखना। इतना कहकर अविनाश पलटकर सो गए। मैं स्तबध रह गई। दिमाग में द्वंद् चलने लगा।
एक तरफ़ नीलम के कहे शब्द मुझे मेरा कर्तव्य याद दिला रहे थे तो दूसरी तरफ मन विद्रोह करने को तैयार था। मेरी क्या गलती थी? अविनाश और वंदन की नजरों में भले ही मैं वंदना के कर्तव्य पूरा करने के लिए लाई गई थी, पर मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मैं नहीं चाहती थी कि जो सौतेलेपन का दंश बचपन से लेकर अब तक झेला है। वो वंदन के हिस्से में आए, लेकिन मेरी इस निश्छल ममता को भी शक के कटघरे में खड़ा कर दिया। पड़ोस वाली राधा चाची अम्मा को बार-बार समझा देती। मुझे ये जरुरत से ज्यादा प्रेम ठीक नहीं लगता। देखना ! एक बार खुद के बच्चे हो जाएंगे तो वदंन को एक तरफ कर देगी। ये तो सब दिखावा है, दिखावा। ये सुनकर मन कसैला हो गया।
अम्मा के मन में डर बैठ गया लेकिन उन्हें क्या पता था। कि अविनाश ने मुझे छुआ भी नहीं है। पर मैंने उन्हें कह दिया कि इस घर का वारिस सिर्फ वंदन ही रहेगा। तब जाकर अम्मा को तसल्ली मिली। मेरे इस वाक्य ने मुझे अम्मा के दिल में जगह दे दी। फिर अम्मा ने मुझे विस्तार से वंदना और अविनाश के प्रेम प्रसंग से लेकर विवाह की बातें बताई। वंदना अविनाश के सबसे गहरे दोस्त धीरज की बहन थी, इसलिए शादी में कोई खास दिक्कत नहीं आई। वंदना और अविनाश की शादी के बाद भी धीरज और अविनाश में जीजा साले से अधिक दोस्ती का रिश्ता था। वंदना धीरज की इकलौती बहन थी। उन्हीं से मुझे पता चला कि अगले महीने धीरज का विवाह है। और अविनाश उसमें शरीक होने अकेले ही जा रहे हैं। ये सब सुनकर मैं सोचने पर मजबूर हो गई।
मैं अपने दुख को इतना बड़ा समझ बैठी कि वंदना के परिवार वालों को भूल ही गई। वंदन भी तो आखिर धीरज का भांजा है। उसकी निशानी वंदन तो है न… उनका मन नहीं करता होगा वंदन से मिलने का ? जरूर करता होगा। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण वंदन अपने नाना-नानी से मिलने से वंचित रहे, इसलिए मैंने भी शादी में जाने का निश्चय कर लिया। जब मैंने अविनाश को इस फैसले के बारे में बताया तो उन्होनें सिर्फ इतना कहा जैसे तुम्हारी इच्छा। लेकिन अगर वहां तुमसे किसी ने कुछ कह दिया तो मैं जवाबदार नहीं रहूंगा। ये सुनने के बाद भी मैंने शादी में जाने के फैसले को नहीं बदला।
सब बातें याद करते कब झपकी लग गई, पता ही नहीं चला। आंख खुली तो देखा अविनाश बिस्तर पर नहीं है। आज संगीत का कार्यक्रम है। मैं फटाफट तैयार होकर नीचे आ गई। मेरी निगाहें वंदन को खोजने लगी। वंदन नए कपड़े पहनकर और तैयार होकर अपनी नानी की गोद में खेल रहा था। थकान के कारण झपकी लग गई थी। इसने कुछ खाया? मैंने हंसते हुए पूछा। खाया? अरे भूख के मारे कितना रोया। मैंने बॉटल से दूध पिलाकर सुला दिया था। बस आधे घंटे पहले उठा है। तुम्हें तो बच्चे का जरा होश नहीं है। हमारे सामने ये हाल है तो घर में क्या होता होगा। जब ये पैदा हुआ था तो वंदना इसे आंखों से ओझल नहीं होने देती थी। मम्मी ने ताना मारा। मैं वहां से उठ्कर दूसरी महिलाओं के साथ बैठ गई। धीरज भी वहीं खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा। वंदन अपने नाना की गोद में खूब थिरका। धीरज मुझे कनखियों से देख रहा था। पर नजरें मिलते ही वो मुंह फेर लेता।
दो दिन तक वंदन मेरे पास कम और नाना-नानी की गोद में ज्यादा खेला। सेहरा बांधे और घोड़ी पर चढ़ा धीरज किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था। सेहरा बांधते वक्त वंधना की याद में उसकी आंखें नम हो गई। मैं जानबूझकर सामने नहीं आई। मैं नहीं चाहती थी कि मुझे देखकर नफरत से ये नमी सूख जाए। फेरों के बाद वर-वधू पैर छू रहे शे। मम्मी व्यस्त थीं, इसलिए मैं वंदन को गोद में उठाकर थपकी देकर सुला रही थी। आशीर्वाद नहीं देंगी दीदी, आवाज सुनकर पलटी तो देखा धीरज और उसकी दुल्हन सामने खड़े थे। दोनों ने झुककर मेरे पैर छुए । खुशी के मारे आशीर्वाद के शब्द जबान में ही चिपक गए।
दीदी, मैं ये तो नहीं जानता कि आप मेरे बारें में क्या सोचती हैं, लेकिन मैं इतना जरुर बताना चाहूंगा कि मैंने हमेशा आप में वंदना दीदी की झलक देखी है। वंदन को जो आपने प्यार दिया है, वो अमूल्य है। जब वंदना दीदी की मृत्यु हुई थी, तब मैंने सोचा था कि अब वंदन पर हमारा हक खत्म हुआ। आप तो महान हैं दीदी, जो आपने अपने पति की पहली पत्नी के परिवार को इतना सम्मान दिया। अगर आपकी जगह कोई और लड़की होती तो ससुराल में पहला कदम रखते ही अपनी सौत के वजूद मिटाने में जुट जाती, लेकिन आपने उसके अदृश्य अस्तित्व को स्वीकार किया है। सबकी नजरों में भले ही ये कोई बड़ी बात न हो, लेकिन आपने सारे कुंआरे सपने तोड़े होंगे। फिर भी आपने टूटे सपनों के कांच से अपने वर्तमान को जख्मी नहीं होने दिया। धीरज ने मेरा हाथ अपने हाथ में थामकर ये शब्द कहे तो मैं सचमुच बिलख -बिलख कर रो पड़ी। मम्मी पापा, अविनाश और बाकी लोग जड़वत खड़े इस दृश्य को देख रहे थे। मैंने धीरज को गले लगा लिया। सबकी आंखें नम हो गई।
दुल्हन को गृहप्रवेश करवाकर और बाकी रस्मों को निपटाते हुए रात के दो बज गए। वंदन भी जल्दी सो गया था। कपड़े बदलकर मैं भी लेट गई। हमेशा की तरह अविनाश ने आंखें बंद कर ली। अचानक मुझे अपने हाथ पर किसी का स्पर्श महसूस हुआ। अविनाश ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और हौले से दबा दिया। बिना कुछ कहे मैं सब कुछ समझ गई और अविनाश के सीने पर अपना सिर रख दिया। ऐसा लग रहा था, मानो प्यासे रेगिस्तान पर बारिश की बूंद पड़ रही हो। अविनाश ने अपनी बांहों के घेरे को और मजबूती से कस लिया। मैंने भी अपने आपको छुड़ाने की कोशिश नहीं की और आंखे बंद कर ली, लेकिन इस बार मेरे मन में भविष्य के प्रति संशय भरे विचार की जगह एक सुखद जीवन का सपना तैर रहा था।

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