आज़माइश-ए-इश्क़-हरीश पांडे

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अंकित और प्रिया की शादी को आज एक साल पूरा हो गया था। दोनों ही अपने इस अद्वितीय गठबंधन से खुश थे। सालगिरह के मौके पे उन्होंने शाम को घर पर एक छोटा सा उत्सव समारोह रखा था। सारी तैयारियां हो चुकी थी। अभी मेहमानों के आगमन में थोड़ा बहुत समय था। उन दोनों के अलावा घर मे अभी कोई नहीं था। अंकित के माता पिता मंदिर में प्रसाद चढ़ाने गए हुए थे। अंकित नया कुर्ता पायजामा पहनकर तैयार हो चुका था। प्रिया अपने कमरे में तैयार हो रही थी। अंकित ने दरवाज़े पे ठकठकाते हुए कमरे में प्रवेश होने की अनुमति मांगी। प्रिया ने हंसते हुए आंखों से अंदर आने का इशारा कर दिया।
“बहुत खूबसूरत लग रही हो प्रिया। शादी वाले दिन की तरह ही।” अंकित ने प्रिया को देखते हुए बोला।
“एक साल कैसे बीत गया न। लगता है मानो कल की ही बात है।” प्रिया ने अपने सामने लगे शीशे में देखते हुए अपनी साड़ी को ठीक करते हुए बोला।
“हाँ, बहुत हंसी खुशी बीता है ये एक साल। मेरा सौभाग्य है कि मेरे जीवन मे तुम हो।” अंकित पास में ही लगे बिस्तर पर बैठते हुए बोला।
“अच्छा, मुझसे नहीं पूछोगे कि मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य तुमसे शादी करना?” प्रिया ने जो उन दोनों के बीच दोस्ती पनप चुकी थी उसका इस्तेमाल करते हुए व्यंग्यात्मक तरीके से पूछा।
अंकित प्रिया का व्यंग समझ तो गया था फिर भी उसने कुछ असहजता सी महसूस की। उसका चेहरा इस  वेदना को छिपाने में असमर्थ रहा।
प्रिया ने इसे तुरंत भाँप लिया। वो अपने श्रृंगार को छोड़कर अंकित के करीब पहुँची और बोली,” तुम्हें पता है ना, मैं मज़ाक कर रही थी। हम दोनों पति पत्नी के अलावा काफी अच्छे दोस्त भी हैं। है ना?”
“हाँ बिल्कुल। इसलिए मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हुँ। मुझे उम्मीद है कि तुम मुझे गलत नहीं समझोगी। ये बात मेरे मन को कचोटती रहती है इसलिए मुझे तुमको बताना बहुत जरूरी है।” अंकित ने अपनी वेदना को ज़ुबान देने की कोशिश करते हुए कहा।
“आप निसंकोच मुझे सब कुछ बता दीजिए। मैं आपको कभी गलत नही समझूँगी, ये आपसे वादा है मेरा।” प्रिया ने अंकित का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए उसे आश्वस्त किया।
अंकित ने भी ज्यादा समय न लेते हुए सब कुछ सच सच बोलना शुरू किया,” मैं कॉलेज में एक लड़की से प्यार करता था। उसका नाम शालिनी था। वो हमारे जाति सम्प्रदाय से बाहर की थी। वो बहुत ही समझदार एंवम संस्कारी लड़की थी। फिर एक दिन मैंने उसे अपने घरवालों से मिलवाने का फैसला लिया। मम्मी पापा काफी नाराज़ हुए पर  फिर वो मिलने को राज़ी ही गये। लेकिन उनक मिलना न मिलना एक बराबर ही रहा। उन्होंने मेरे सामने ही उसको खूब खरी खोटी सुनाई और मैंने जब बीच बचाव में कुछ भी बोलना चाहा तो मुझे भी लताड़ लगाई। इसके बाद मेरे और घरवालों के बीच हमेशा एक तनाव सा रहने लगा। मैं हर चीज़ में उनसे बग़ावत करने लगा। पर मेरे और शालिनी के बीच अभी भी रिश्ता वैसा ही था। उसके व्यवहार में भी मेरे लिए कोई बदलाव नही आया था और न ही मेरे घरवालों के लिए कोई बैर भाव था। मैंने शालिनी को भाग के शादी करने का भी प्रस्ताव दिया पर उसने इसे सिरे से खारिज़ कर दिया। वो चोरी छुपे कुछ नही करना चाहती थी। मैं उसको पूरी शिद्दत से चाहता था और उसके लिए कुछ भी कर सकने की हिम्मत थी। पर घरवाले भी मेरी ज़िद के आगे चट्टान की तरह ही खड़े थे। उन्होंने मुझे समझाने के लिए काफी हथकंडे अपनाए। काफी भावनात्मक दाँव-पेंच भी खेले।”
अंकित एक ही सांस में ये सब बोलते बोलते रुका। अभी तक उसने अपनी नज़र झुका ही रखी थी लेकिन वो प्रिया के चेहरे के भाव देखने के लिए रुका था। प्रिया बहुत विश्वास के साथ ये सब सुन रही थी। अंकित की अंदरूनी डगमगाहट समझकर उसने उसका हाथ सहलाते हुए बोला,” फिर क्या हुआ?”
अंकित ने भरोसा पाकर फिर बोलना शुरू किया,” फिर एक दिन मुझे शालिनी ने मिलने के लिए बुलाया। मिलने पर उसने मझसे ढेरों बातें की। फिर उसने मुझे समझाना शुरू किया कि हम दोनों को अब अलग होना पड़ेगा। इस रिश्ते को यहीं पूरे सम्मान के साथ खत्म कर देने को कहा। मैंने उसको दिलासा देने के लिए कहा कि मैं दोबारा घर मे शांतिपूर्ण तरीके से बात करके देखूंगा पर उसने ऐसा करने को साफ मना कर दिया। उसने कहा कि बात उनको समझाई जाती है जिनको गलत सही की समझ नहीं होती। हमारे माँ बाप बहुत समझदार हैं उनको कोई डर या लालच देकर कुछ करना सही बात नहीं होगी। और वो अगर जबर्दस्ती करके कल को इस घर की बहू बन भी जाती है तो भी इसमें किसी का भला नहीं होगा। शादी खुशी से होनी चाहिए न कि जोर जबर्दस्ती से। किसी न किसी को यहाँ त्याग करना ही होगा तो बेहतर है कि हम दोनों ही करते हैं।
मैंने उसे बहुत समझाया कि मैं उसके बिन नहीं जी पाऊंगा। उसने बिना आंखों में आंसू लाए मुझसे सिर्फ एक ही बात कही कि अगर मैं उससे सच में प्यार करता हुँ तो फिर कभी नहीं मिलूंगा और अपनी घरवालों की इच्छानुसार शादी करूँगा। उसने मुझसे वादा भी लिया कि मैं कभी उसके लिए अपने घरवालों के विरुद्ध नहीं जाऊंगा। मैं हर तरह से विवश था पर उसके लिए मैंने ये कसम भी खाई। इसके बाद वो वहां से चली गयी और फिर कभी मेरी बात नही हुई उससे।”
अंकित की आंखों से लगभग दो तीन आँसू टपक चुके थे उसके आखिरी वाक्य के पूरे होने से। उसका सर फिर से झुका हुआ ही था। प्रिया ने अभी तक मुँह से कोई प्रतिक्रिया नही दी थी पर जो सबसे अच्छी चीज वो कर सकती थी उसने की। धीरे से अपने पति को गले से लगाके उसकी पीठ सहलाने लगी।
दो पल की खामोशी के बाद अंकित बोला,” उसके बाद पता है क्या हुआ?”
प्रिया ने बिना किसी असहजता के पूछा,” क्या हुआ फिर?”
“फिर मैं जैसे तैसे घर आया खुद को संभालते हुए। मेरे पहुचने से पहले घर मे एक तांत्रिक बाबा पहुंचा हुवा था। मुझे उसके सांमने बैठाया गया। और वो बोलने लगा कि इसपर तो बहुत भयंकर वशीकरण किया हुआ है। काला जादू है। मुझे उसकी बातें सुनके मन ही मन हंसी आयी पर मैं कुछ नहीं बोला। अजीब स्थिती थी…मेरी आँखों के सामने नौटंकी चल रही थी और सच्चाई मेरे प्यार की तरह बेबस कहीं ख़ुदकुशी कर रही थी। मैं पागलों की तरह दहाड़ मार कर रोने लगा। काफी रोया बिना कुछ बोले। मम्मी के गले लगके रोता रहा। इतना रोया की रोते रोते सो गया। पर नींद में भी मुझे बस ये ही सुनाई दे रहा था कि ये सब उस चुड़ैल का किया धरा है।”
अंकित की बातें सुनकर अब प्रिया की आंखें भी भर आयी थी। वो अपनी पति की हृदय पीड़ा समझ रही थी। उसे अंकित पे असीम प्यार आ रहा था और साथ ही साथ अंकित के लिए सम्मान भी बढ़ गया था। उसे अपने लिए इतना तो मालूम चल गया था कि इस एक साल में वो अपने पति की एक ऐसी दोस्त बन चुकी है जिसे वो कुछ ऐसाभी बता सकता है जो उसने सब से छुपाकर रखा था। ये एक साल उनके दाम्पत्य जीवन में एक नया मापदंड स्थापित करके जा रहा था।
उधर अंकित के माँ बाप अपने बेटे की पहली सालगिरह की कामयाबी के  तथाकथित सूत्रधार तांत्रिक बाबा को 11000 की दक्षिण देकर खुद को धन्य समझ रहे थे।

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