आखिर क्यों शादी में निभाई जाती है कन्यादान की रस्म

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बेटियां हर घर की आन बान शान होती है अक्सर कहा जाता है  कि बेटियों के बिना घर सूना सूना होता है। और साथ ही यह भी कहा जाता है कि पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद इस पुरुष में अपनी बेटी का कन्यादान नहीं किया तो सोचो उसे कोई भी पुण्य नहीं मिला क्योंकि इस दुनिया में कन्यादान को महादान कहा जाता है इससे बड़ा कोई दान   नहीं होता है।
हमारे वेदों और शास्त्रों में कन्यादान को सबसे बड़ा दान कहा गया है आपकी किस्मत से भी जोड़ा गया है कन्यादान का अर्थ है अपनी बेटी का हाथ एक ऐसे पुरुष के हाथ में देना जो बिल्कुल ही आपकी बेटी की जिम्मेदारी निभाने की योग्यता  रखता हो । जिसके सभी उत्तरदायित्व की पूर्ति उसके ससुराल वाले ही करते है। कन्यादान हिंदू धर्म के रीति-रिवाज में बहुत अधिक मायने रखता है।
कन्यादान के बाद कन्या नये घर में जाकर परायेपन का अनुभव न करे, उसे भरपूर प्यार और अपनापन मिले। सहयोग की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना चाहिये। कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं। वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों में पकड़कर, इस जिम्मेदारी को स्वीकार करता है।
कन्या के रूप में अपनी पुत्री, वर को सौंपते हुए उसके माता-पिता अपने सारे अधिकार और उत्तरदायित्व भी को सौंपते हैं। कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परंपरा से नहीं, पति परंपरा के अनुसार होंगे। कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने और पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियां प्रदान कर रही हैं । इस भावना के साथ कन्यादान का संकल्पबोला जाता है। संकल्प पूरा होने पर संकल्प करने वाला कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप देता है, यही परंपरा कन्यादान कहलाती है।

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