आँखों वाले अंधे

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शाम का धुंधलका हो चला था। वे दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए सड़क किनारे आहिस्ता-आहिस्ता चले जा रहे थे।
लड़का कभी लड़खड़ाता तो लड़की उसे सहारा देकर संभाल लेती।
उन्हें दूर से आता देख वहां खड़े लोगों में से एक बोला ” क्या जमाना आ गया है, शर्म तो जैसे इन लोगों ने बेच ही खायी है।”
” मुझे लगता है कहीं से नशा करके आ रहे हैं।” दूसरा बोला।
“अरे ! जवानी का नशा क्या, किसी नशे से कम है।” तीसरे ने अपनी बात रखी।
“देखो तो हीरो ने शाम को भी क्या काला चश्मा लगा रखा है, जरा नजदीक आने दो इन्हें फटकार लगानी है, यहां ऐंसा नहीं चलेगा।”चौथे का स्वर कुछ तल्ख था।
तब तक वे दोनों उनके नज़दीक आ चुके थे। लड़की ने वहां आते ही उन्हें एक पता बताते हुए उनसे पूंछा ” क्या इस पते पर इन भाई साहब को पहुंचाने में आप मदद करेंगे ,यह दोनों आंखों से लाचार हैं, बस स्टॉप से मैँ इन्हें यहां तक लाई हूँ, बस में इनके बगल में रखी सहारे वाली छड़ी किसी उचक्के ने गायब कर दी, यह बहुत परेशान हो गए थे।”
लड़की की बात सुन, वे चारों मन ही मन जैसे एक दूसरे से कह रहे थे -“धिक्कार है हमें अपने आंखों वाले अंधे होने पर।”

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