अस्थमा के लक्षण एवं उपचार

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अस्थमा फेफड़े पर असर करने वाली एक बिमारी है। सांस लेने में श्रम अनुभव करना या कठिनाई होना अस्थमा कहलाता है। इस बिमारी की अवस्था में रोगी को श्वास बाहर निकालने में जोर लगाना पड़ता है और लोहार की धौंकनी जैसी गति हो जाती है। इसका मुख्य कारण श्लेष्मा के अत्यधिक स्श्राव से श्वासनली का संकुचित हो जाना है। जो श्वासनली फेफड़े मे हवा पहुँचाती है, वह सामान्य से अधिक सँकरी हो जाती है ।
हवा मार्ग की दिवार की पेशियों के सख्त हो जाने से हवामार्ग की भीतरी परत में सूजन आ जाती है और चिपचिपा बलगम जमा होने लगता है, जिससे हवामार्ग रुक जाता है। ऐसी स्थिति में फेफड़े तक हवा पहुँचने और बाहर निकलने में रुकावट आती है तथा रोगी को सांस लेने मे तकलीफ होने लगती है।
अस्थमा के मुख्य लक्षण है खाँसी, घबराहट, छाती में जकड़न और पूरी श्वास न ले पाना। इसके साथ ही दूसरे लक्षण भी उभरते है, जैसे , नींद में रुकावट , कसरत के दौरान दम फूलना, सर्दी और खाँसी, आलस्य, अवसाद और प्रमाद, अपच एवं बहुमूत्र आदि। अस्थमा के कारणों में सबसे बड़ा कारण एलर्जी का होना है।
इसके साथ ही वायु प्रदूषण , शारीरिक और मानसिक तनाव , अनेक तरह की एलर्जी तथा विशेष रुप से अस्त – व्यस्त जीवनशैली आदि के कारण भी यह बिमारी उत्पन्न होती है। समाधान के तौर पर आधुनिक चिकित्सा पध्दती में एलोपैथिक एवं ऐंटीबायोटिक्स दवाओं के प्रयोग अस्थमा के प्रभाव को आंशिक रुप से अल्प समय के लिए नियंत्रित कर देते है । ऐसे में योग चिकित्सा एक कारगर उपाय के रुप मे सामने आती है । इस अध्ययन में योग के इसी महत्व को उभारा गया हैं । हठयोग की प्रक्रिया संपूर्ण आरोग्य देने मे समर्थ है ।
प्रणायाम करना जरूरी है प्राणायाम से प्राण प्रवाह संतुलन और नियंत्रण प्राप्त होता है । उपचार की दृष्टि से नाड़ी शोधन प्राणायाम से सभी शरीरस्थ नाड़ी की शुध्दि होती है तथा कफ , जुकाम आदि विकार शांत होते हैं। सूर्य भेदन प्राणायाम एलर्जी तथा कफ , वात आदि रोगों को दूर करने मे सहायक हैं। उज्जायी प्राणायाम कंठ , फेफड़े , नाक , कान व गले आदि के रोगों मे अत्यंत लाभदायक है । महामुद्रा के अभ्यास से बुखार, कफ व गले के रोगों मे लाभ होता है ।
दोस्तों अस्थमा की बिमारी तथा विभिन्न श्वास रोगों मे हठयोगी अभ्यास के रुप मे योग चिकित्सा अधिक लाभदायक उपाय है।

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