अनुपम-Swapnil Ranjan Vaish

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अक्सर सुना है कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, पर उसने तो सब कुछ खो दिया, फिर भी कुछ नहीं पाया। मेरी सहेली अनुपम… जैसा नाम वैसी ही व्यक्तिव की धनी थी, सबसे अलग, और सबकी चहेती। हरियाणा के रेवाड़ी की रहनेवाली जटणी थी, गोरा रंग, लंबे बाल पर भाव थोड़े कम ही दिखते थे उसके चेहरे पर। पढ़ाई में तेज़ थी वहीं खेल कूद में भी सबसे आगे, कॉलेज की छुट्टी वाले दिन जब हम सब अपने बिस्तरों से निकलने की सोच भी नहीं सकते थे, वो सुबह के 6 बजे छात्रावास छोड़ घुड़सवारी के लिए निकल जाया करती थी।
जब मैंने उसे पहली बार देखा था, तब ये एहसास नहीं था कि वो मेरी सबसे पक्की सहेली बन जायेगी क्योंकि वो कम बोलती थी और हर किसी से बात करने की आदत नहीं थी उसे। हम एक ही कमरे में 4 लड़कियां रहती थीं, सबकी अलग संस्कृति, अलग भाषा और अलग जीवनशैली पर समय के साथ हम चारों एक दूसरे के काफी करीब आ गए थे। अनुपम और मेरे विषय एक ही थे सो हम दोनों पक्की सहेलियां बन गए।
वो रात रात भर बातें करना, तेज़ आवाज़ में गाने बजाकर नाचना, हॉस्टल वार्डन को मक्खन लगाना और अपनी बाल्टी के साथ अपने रूम मेट्स की बाल्टी को भी नल की लाइन में लगाना; सब उस समय कितना साधारण लगता था पर अब वही यादें किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नहीं हैं। अनुपम भी धीरे धीरे बातूनी हो गयी और मस्ती करने में भी सबको पछाड़ने लगी, पर अपने जीवन के उद्देश्य से उसकी नज़रें कभी नहीं हटीं। वो टॉप करके एक बड़ी कंपनी में कार्यरत होना चाहती थी, उस कंपनी की जब भी कोई खबर अखबार में छपती तो फौरन उसे काट कर कमरे की दीवार पर चिपका दिया करती थी। पूछ्ने पर कहती “ मैं हर समय अपने सपने को अपनी आंखों के सामने देखना चाहती हूँ जिससे उसे सच करने की शक्ति मुझे मिलती रहे”,उसकी बातों को सुन कर हम सब अपने आप को बड़ा छोटा महसूस करते, क्योंकि हमें तो यह भी नहीं पता था कि हमारा कैंपस प्लेसमेंट होगा भी या नहीं। पर अनुपम तो जैसे बिल्कुल तैयार थी, कॉलेज के पहले दिन से ही।
एक दिन बातों बातों में हम सब सहेलियां अपनी शादी की बातें करके मज़ाक कर रही थीं और अनुपम तभी अलमारी से मैगज़ीन का एक टुकड़ा निकाल कर हमारे सामने खड़ी हो गयी। “ ये क्या है अनुपम, ये लहँगा तो बहुत सुंदर है…यह कहाँ से मिला तुझे?” मैंने उत्सुकतावश उससे पूछा। “ये मैंने यहाँ आने के बहुत पहले से फ़िल्मफ़ेअर मैगज़ीन से काट कर रखा था, अपनी शादी में मैं यही लहँगा पहनना चाहती हूँ… काश कि मेरी जल्दी से नौकरी लग जाये और मैं बहुत से पैसा जमा कर लूं तो खुद ही ले लूंगी, पापा इतने महंगे लहँगे के लिए मांनेगे नहीं और मैं वो कॉलर वाली चोली का लहँगा पहनना नहीं चाहती।” अनुपम की बातें सुन कर हम फिर हैरान थे, पता नहीं उस लड़की ने अपने मन की गहराइयों में न जाने कितने राज़ छुपा रखे थे। मैं मन ही मन सोच रही थी क्या मैं कभी अनुपम को समझ पाऊंगी या नहीं।
बहराल हमारी परीक्षाएं खत्म हुईं और एक दुसरे को कभी न भूलने का वादा करके हम सब अपनी उस ज़िन्दगी की यादें बटोर कर अपने अपने घर चले आये। दो महीनों की कड़ी मेहनत के बाद मुझे एक अच्छी कंपनी में पसंद की नौकरी मिल गयी। मैंने सबसे पहले अनुपम को फ़ोन किया और ये खुशी उसके साथ बांटने का मन बना लिया।
“ हेलो अनुपम… कैसी है तू? पता है मेरी जॉब लग गयी है गुड़गाँव में। अब आएगा मज़ा हम दोनो साथ रहेंगे फिर से। तेरे भैया ने तेरी जॉब की बात तो कर ही ली होगी, कब है तेरी जॉइनिंग?? बोलती क्यों नहीं कुछ क्या हुआ?” मेरे सवाल के जवाब में मुझे सिर्फ उसकी सिसकियां सुनाई दीं और मेरी आवाज़ भी कहीं खो गयी। मैं उसके कुछ बोलने का इंतजार करते हुए फ़ोन पकड़े उसकी सासों की उदासी महससू कर पा रही थी, मैं कभी किसी को रोने से नहीं रोकती, शायद उस वक़्त रोने वाले का बोझ कुछ पानी के कतरे बहाने से कम हो जाये। वो कहते हैं न कि आँसुओ में बहुत वज़न होता है तभी तो उनके बह जाते ही इंसान खुद को हल्का महसूस करने लगता है। फ़ोन रखते वक़्त अनुपम ने बस इतना कहा “ हो सके तो टाइम निकाल कर मुझसे मिल लेना, मैं बहुत अकेली हो गयी हूँ यहाँ। तेरा इंतज़ार करूँगी…”। फ़ोन रखते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए, ये सोच कर कि जिस अनुपम के लिए उसके परिवार से बढ़ कर कुछ नहीं था, उन सब के साथ होते हुए वो अकेली कैसे हो सकती है।
मेरी खुशी, मेरा उत्साह सब अनुपम की अश्रुधारा के साथ बह गया था। एक हफ्ते बाद मैंने ड्यूटी जॉइन करी, मन खुश होना तो चाहता था लेकिन आत्मा पर अनुपम की सिसकियों की छाप अभी इतनी मजबूत थी कि मेरे मन की सारी खुशी निगल गयी। सप्ताहांत पर मैंने रेवाड़ी की टैक्सी करी और पहुच गयी अनुपम के घर।
उसका घर आधुनिकता से कोसों दूर था, आँगन में गाय और कुछ बछड़े बंधे हुए थे, फ़र्श टाइल्स का नहीं बल्कि ईंटों के आड़े टेढ़े टुकड़े से सजा एक कालीन जान पड़ता था। मैंने बाहर से ही अनुपम को आवाज़ लगाई, उसकी माँ निकल कर आयीं, वो मुझे फौरन पहचान गयीं और अंदर ले जाकर केन के सोफे पर बैठा कर अनुपम को आवाज़ लगाई। मेरी आँखें पूरे कमरे को ताक रही थीं और मैं सोच रही थी कि जिनका बेटा इतनी बड़ी कंपनी में कार्यरत हो, डॉलर में कमा रहा हो उनके घर की ऐसी हालत कैसे। अचनाक अनुपम के स्वर ने मुझे मेरी सोच के दायरों से बाहर खींच लिया।
उसे देखते ही मैं उससे लिपट गयी और उसने धीरे से मेरे कान में कहा “ नौकरी की बधाई हो”, मैंने उसका हाथ थाम कर कुछ कहना चाहा तभी वो अपनी माँ से बोली “ माँ आज स्वप्निल यहीं रुकेगी, उसे दाल बाटी बहुत प्रिय है। क्या आप उसके लिया बना देंगी?” मैं मना ही नहीं कर पाई और उस दिन वहीं रूकना स्वीकार कर लिया। अनुपम मुझे अपने कमरे में ले गई, जिसकी दीवारों का पेंट कहीं कहीं से उखड़ा हुआ था। मेरे कुछ पूछने से पहले ही अनुपम ने मुझसे पूछा “ अच्छा बता कैसा है तेरा ऑफिस, कितने लोग काम करते हैंं तेरे साथ, तेरे बॉस कैसे हैं, तुझे पहला असाइनमेंट क्या मिला…” “ अरे बस कर अनुपम मैं यहाँ अपनी नहीं तेरी सुनने आयीं हूँ, ये बता तू इतना रो क्यों रही थी और तूने ये क्यों कहा कि तू यहाँ अकेली है…बता अनुपम।
पता है…मुझे तेरी कितनी चिंता हो रही थी? और तेरी नौकरी का क्या हुआ?” मैंने अपनी जगह से उठते हुए कहा। अनुपम ने मेरा हाथ थामा और मुझे छत पर ले गई। ढलते हुए सूरज की तरफ इशारा करते हुए उसने मुझसे कहा “ मेरे सपने कभी मेरे थे ही नहीं स्वपनिल, जो सपने पूरे करने मैं तुम सब के साथ पढ़ रही थी वो तो एक छलावा था एक मिराज था”, और उसकी आँखें फिर नम हो गयी।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसके लफ़्ज़ों ने आवाज़ का दामन थामा। “ मैं जब घर वापस आई, बहुत ख़ुश थी, मेरे सपने मेरी आँखों के सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे। मैंने भैया को अपना रिज्यूम फारवर्ड कर दिया क्योंकि वो उस बड़ी कंपनी के एक बड़े अवसर को जानते थे। उन्हींं ने मुझसे भी बात करी थी और विश्वास दिलाया था कि मेरे मार्क्स बहुत अच्छे हैं तो नौकरी तो पक्की ही है…बस इंटरव्यू के लिए गुड़गाँव आना होगा और पोस्टिंग भी वहीं होगी। मैंने भैया से बात करी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और कहा यहाँ आकर मुझसे बात करेंगे।” “ तो क्या कहा तेरे भैया ने…?”, मेरी उत्सुकता अपनी पराकाष्ठा तक पहुँच चुकी थी।
“ भैया भाभी जब यहाँ आये थे, तब दीदी और जीजू भी उनसे मिलने आ गए थे, घर में खूब रौनक थी और मेरे मन में भी। बच्चों के कोलाहल से हर कोना गूँजता था। एक दिन शाम की चाय पीने जब सब लोग आँगन के नीम के नीचे बैठे तब मैंने भैया से अपनी नौकरी की बात छेड़ी, उन्होंने चाय का कप रखते हुए बोला देख अनुपम पापा ने तुझे उच्च शिक्षा करने के लिए बाहर भेजा, तूने अच्छा भी किया, लेकिन नौकरी की बात भूल जा।
मुझे लगा कि भैया मज़ाक कर रहे हैं, पर वो गंभीर थे। दीदी ने भी भैया का समर्थन करते हुए कहा कि गुड़गांव का माहौल ठीक नहीं, तू घर में ही सुरक्षित रहेगी, यहीं घर पर ट्यूशन क्यों नहीं देती बच्चों को। ये सब बातें सुन कर मेरे माता पिता चुप थे, और मैं इसी असमंजस में थी कि जब नौकरी करने जाने की अनुमति देने ही नहीं थी तो मुझे आगे पढ़ने भी क्यों भेजा, क्यों नहीं मेरे सपनों को उसी समय कुचल दिया गया जब वो पैदा हुए थे, क्यों मेरे इरादों को इतना हौंसला दिया कि वो सत्य के धरातल से उड़ान भर सातवें आसमान पर पहुच गए। ये सब मैं सोच रही थी, लेकिन बड़ोंं के आगे बोल नहीं पाई।
तभी भैया ने आगे विस्तार से कहा देख अनुपम, मैं विदेश में रहता हूँ और कल्पना भी अपनी गृहस्थी में बहुत उलझी रहती है सो मम्मी पापा अकेले पड़ जाते हैं न…इस बात का हमें तेरे हॉस्टल जाने के बाद एहसास हुआ। जो तू भी गुड़गाँव चली जायेगी और नौकरी में व्यस्त रहेगी तो इनका ध्यान कौन रखेगा। मुझे गलत मत समझना बहन लेकिन तेरी भी उतनी ही ज़िम्मेदारी है जितनी मेरी या कल्पना की।
मैं खामोश थी, पर मेरे अंदर तो विचारों का दंगल हो रहा था, लगता था जैसे अभी तक मैं गैरों में पल रही थी, जहाँ सब अपने दायित्वों से पीछा छुड़ाने के लिए मेरे मॉसूम सपनों की हत्या कर रहे हों। मैंने बिना कुछ कहे हाँ में अपना सर हिला दिया और चाय के कप चौके में रखते ही अपने कमरे में जाकर खुद को बंद कर लिया। अपने सारे सपने जो मैंने दीवारों पर सजा रखे थे उन्हें नोच डाला, और बस आंखों में सैलाब लिए सो गई।
रात को जब माँ ने खाने के लिए दरवाज़ा खटखटाया तब आंख खुली, मैंने कमरे का दरवाज़ा तो खोल दिया लेकिन मेरे मन ने मेरे अपनों के लिए सारे दरवाज़े जैसे बंद कर लिए थे, मैं अपने आप को छला हुआ महसूस कर रही थी। माँ ने मुझे गले से लगाते हुए कहा बेटी मुझे और तेरे पापा को माफ कर दे, हम तेरे सपनों के बीच आ गए पर तू पूरी बात न जाने। माँ ने बताया जब मैं छात्रावास में थी तब उन दोनों की तबीयत काफी खराब हो गयी थी, मेरी परीक्षायें थी सो पापा ने मुझे कुछ
भी बताने से मना कर दिया था। दीदी को अपने ससुराल से महीने भर के लिए आना पड़ा और उसकी भैया से भी बहुत लड़ाई हुई थी क्योंकि वो सिर्फ पैसे भेज रहा था, लेकिन दीदी को माँ पापा की सेवा भी करनी पड़ती थी और घर का काम भी। वो बेमन सब कर तो रही थी पर मुझे और भैया को कोस भी रही थी, शायद तभी उन दोनोंं ने मेरे भाग्य का ये फैसला किया। मेरी माँ और पापा उनके फैसले पर कुछ न बोल सके क्योंकि भैया हर महीने घर के खर्चे के किये पैसे भेजते हैं…जो उन्होंने बंद कर दिए तो पापा की ऐसी हालत भी नहीं कि कोई छोटा मोटा काम कर लें।”
“तो तू ये सब चुप चाप होने देगी…अपनी पढ़ाई, इतनी मेहनत को यूँ ही गवां देगी…अरे आँटी अंकल को अपने साथ गुड़गांव ले जा और अपनी नई शुरुआत कर”, मैंने अनुपम को समझाते हुए कहा। “ मेरा परिवार रेवाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकता क्योंकि पापा ने मेरी पढ़ाई के लिए जिन सेठ जी से उधार लिया था वो बकाया है, घर के खर्चों से कुछ बचता ही कहाँ है जो उस सेठ को पैसे दिए जाएं…मैं अब घर में ही रहकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू करूँगी तब धीरे धीरे वो कर्ज़ खत्म होगा”।
मैं हैरानी से अनुपम की बातें सुन रही थी और दुआ कर रही थी कि उसके जैसे भाई बहन भगवान किसी को न दे। बचपन से ही भाई बहन के रिश्ते कितने मासूम और निःस्वार्थ होते हैं, पर वही मासूमियत बड़े होने पर स्वार्थ में बदल जाती है।
“ अनुपम…सच में तेरा दिल बहुत बड़ा है, कितनी गहराई है तेरे विचारों में, तू भी अपने सपनों के लिए अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ सकती थी पर तूने उनका बलिदान देकर अपने माता पिता की सेवा का जो फैसला किया है उससे वो दोनों कृतार्थ हो गए। कहते हैं कि माँ बाप का ऋण कोई नहीं चुका सकता, लेकिन तूने सूद समेत चुका दिया है अनुपम। तूने अपनों के लिए अपनी आहुति दी है…”, मैं और कुछ न कह पाई बस मेरी भावनाएं आँखों के रास्ते अनुपम की अंजुली में कैद हो गईं। मैं उस रात वहाँ रुक न सकी और वापास चली आयी। मेरे भीतर कुछ टूट गया था, जीवन की सच्चाई को शायद मैंने बहुत करीब से महसूस करा।
दो साल बीत गए और मेरी शादी हो गयी, अनुपम मेरी शादी में न आ सकी, क्योंकि उसकी माँ ने किसी बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़ लिया था। अब हमारी बात भी कम होती थी, क्योंकि मैं भी अपने काम और घर का सामंजस्य बैठाने में व्यस्त हो गई।
एक दिन ऑफिस में काम कुछ कम था सो मैंने अनुपम को फ़ोन किया…बहुत सी बातें हुईं। बातों ही बातों में मैंने उसे शादी करने को कहा, तो कहने लगी “मैं क्या करूँगी शादी करके…मुझे तेरी तरह अपनी आज़ादी नहीं गवांनी।” पर मैं समझ गयी कि अनुपम ऐसा क्यों कह रही थी…मेरा मन कच्चा हो गया; जो लड़की अपनी शादी में सबसे महंगा लहँगा पहनने का सपना देखती थी, आज कह रही है “शादी करके क्या करूँगी”। हाय री किस्मत !!
एक साल और बीत गया, रविवार का दिन था, मैं और मेरे पति घूमने निकले ही थे कि अचानक अनुपम का फ़ोन आया, वो बहुत घबराई हुई थी। “ स्वप्मिल जल्दी आ जा पापा को हॉस्पिटल में भर्ती कराया है अभी, लेकिन डॉक्टर कह रहे हैं कि उन्हें बचाना बहुत मुश्किल है”; उसकी काँपती हुई आवाज़ से जैसे मेरे मन में भी कंपन कर गया। मैंने अपने पति से फौरन रेवाड़ी की तरफ गाड़ी घुमाने को कहा और रास्ते में उन्हें सारी बात बता दी। रविवार होने के कारण हमें वहाँ पहुचने में तीन घंटे लग गए। हॉस्पिटल जाकर पता चला अनुपम के पापा नहीं रहे और उन्हें घर ले गए हैं, सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए और न जाने कितने ही ख्यालों का जाल सा मेरे हृदय को निगलता जाता था। बड़ी मुश्किल से मैंने पति को अनुपम के घर का रास्ता बताया।
घर के आगे भीड़ लगी हुई थी, किसी तरह मैंने घर के भीतर प्रवेश किया तो देखा कि अनुपम अपने पिता के मृत शरीर में गंगाजल और तुलसी डाल रही है…उसकी आँखों में आँसू का एक कतरा भी नहीं था और उसकी माँ को कुछ औरतों ने संभाल रखा था। अनुपम की न दीदी थी न भैया…न जाने उन्हें पता भी था या नहीं, जानने के लिए मैंने एक लड़के से पूछा तो उसने बताया कि दीदी को रेलगाड़ी से आने में बहुत वक़्त लागत है और भैया को परसों की फ्लाइट का टिकट मिला है। मैं समझ गयी थी कि अनुपम ने मुझे फ़ोन क्यों किया होगा।
मैंने अनुपम को अपने गले से लगा लिया तो उसकी ताकत जैसे बिखर गई और वो ऐसी रोइ जैसे किसी नदी का बांध टूट गया हो। “सब ख़त्म हो गया स्वपनिल… सब खत्म हो गया, मैं कुछ नहीं कर पाई पापा के लिए और देख न वो चले गए”, अनुपम की बातें मुझे तीर की तरह मेरी आत्मा तक कुरेदती चली गई। मैंने उसे संभालते हुए कहा “ अरे और कितना करती तू अनुपम…जिनको करना चाहिए था उन्होंने तो खबर तक न ली, तू अपने को क्या कोसती है री”।
अपने पिता का अन्तिम संस्कार उसी ने लिया और करना भी उसी को चाहिए था, क्योंकि उसके भैया तो ये अधिकार बहुत पहले ही खो चुके थे। मैंने अपने पति को वापस भेज दिया और कुछ दिन अनुपम और उसकी माँ के साथ बिताने का फैसला किया।
हवन वाले दिन उसकी दीदी और भैया घर पहुँचे, वो घर के भीतर घुसने ही वाले थे कि तभी अनुपम ने उन्हें रोक दिया। “ क्या बात है दीदी, भैया आज एक साथ आये हो। क्यों दीदी क्या उस दिन भी तुम्हारे ससुराल वालों ने आने से मना कर दिया था जब मेरे पापा की गिनती की साँसे बची थीं और वो तुम्हेंं और भैया को एक आख़िरी बार अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहते थे। काश…जो मैं उन्हें अपनी कुछ साँसे दे पाती, तो वो पूरे परिवार को देख लेते और अपने बेटे के हाथों अग्नि ले लेते, लेकिन उन्हें पता था भैया कि आप लाखों पैसे अपनी बीवी की एक ड्रेस के लिए ख़र्च कर सकते हो लेकिन फ्लाइट टिकट पर नहीं इसलिए उन्होंने मुझे कहा आखरी विदाई देने को। और दीदी को भी तो रिज़र्वेशन नहीं मिला होगा A/C डब्बे में, तभी आज तुम्हारी गाड़ी में पधारी हैं”, और अनुपम उस पथरीले आँगन के पत्थरों पर गिर पड़ी। मैंने उसे संभाला और शांत रहने को कहा, लेकिन उसने अपने भैया और दीदी को हवन में बैठने तक की अनुमति नहीं दी और इस बार उसकी माँ उसके साथ खड़ी थीं।
क्यों कुछ बच्चे इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि भूल जाते हैं अपने माँ बाप को जिन्होंने उन्हें अपना रक्त देकर सींचा है। ये बात सिर्फ लड़कों के लिए नहीं है, जब हम हर जगह लड़के और लड़की को एक ही मापदंड पर रखते हैं तो ये मसला सिर्फ लड़कों का नहीं हो सकता…समय आ गया है कि जो बेटियां हर जगह समान अधिकार के लिए, अपने हक के लिए न जाने कितनी लड़ाईयाँ लड़ रही हैं, वो अब अपने माता पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझें।
स्वरचित
स्वपनिल वैश्य

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