अनाथ

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याद है जब तुम लाये थे मुझे पहली बार अपने चौख़ट पर, तब कितनी आतिशबाजियाँ हुई थी। दरवाज़े पर तोरण टंगा था और महावर की भरी कठौती में अम्मा ने मेरे पाँव को डुबोया था। चौखट के पीछे से दीदी ने कहा,”दुल्हिन दहिना गोर पहिले उठाऊ” और जैसे ही मैंने अपना पाँव बाहर रखा था कठौती से, साड़ी और चुनरी में इस कदर उलझी कि गिरने लगी थी। तुमने एक हाथ से अपने धोती के खूँट से बंधी मेरी चुनरी को संभाला और दूसरे हाथ से मुझे संभाला। सब हँसने लगे थे। मैंने घूंघट के नीचे से देखा तुम भी शर्मा गए थे।
और वहाँ से हाथ थामे आँगन तक आये थे जहाँ अम्मा ने ‘चौथ’ पूजा हुआ था। घुटने पर मैं बैठ नहीं सकती थी इसलिए तुमने दीदी से बोल कर मचिया मंगवाया। बाद में भाभी और जीजा लोगों ने मिलकर कितना मज़ाक उड़ाया था।
याद है तब बड़की भाभी ने बोला था बोल रही थी,”बऊआ जी अभी से कनिया के केते फिकिर करइ छ्तिन। बड़ा भाग वाली है दुल्हिन” और तब मुझे भी रश्क़ हुआ था अपने नसीब पर। लगा था सच में मैं नसीबों वाली हूँ। वो महावर का सुर्ख़ रंग उतर आया था मेरी ज़िंदगी में। कितने खुश थे दोनों।
और फिर तुम यहाँ दिल्ली आ गए। इस शहर ने छीन लिया हमारे रिश्ते की सुर्ख़ी। पैसा और पैसा, नाम और नाम, प्रमोशन और बोनस सब में खो गए तुम।
अब तो देखते भी नहीं तुम कि मैंने पहना क्या है? मैं कहाँ हूँ ? मैं कैसी हूँ ? कुछ भी तो तुम नहीं जानते मेरे बारे में अब।
याद नहीं आखिर बार कब मैंने रंगों को महसूस किया था। जानते हो कितनी बार काम करते हुए चोट लग जाती है। चीज़ो में उलझ कर अब भी गिरती रहती हूँ मगर अब तुम थामने के लिए नहीं होते। तुम्हारे साथ रह कर भी तुम्हारे साथ को तरस रही हूँ।
अपने ही घर में अनाथ सी हो गयी हूँ अब।

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