अनंत व्रत कथा

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प्रचीन काल में सुमन्तु नाम के एक वशिष्ठ गोत्रीय मुनि थे ! उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था ! और उनकी पुत्री का नाम शीला था ! दीक्षा के मृत्यु के पश्चात् सुमन्तु मुनि ने करकश से विवाह कर लिया, विवाहोपरांत करकश शीला को बहुत परेसान करती थी ! लेकिन शीला अत्यंत सुशील थी ! सुमन्तु ने अपने पुत्री का विवाह कौंडिन्य मुनि के साथ कर दिया था !
सभी आरम्भ में साथ में ही रहते थे पर सौतेली माँ का व्यवहार देखकर कौंडिन्य मुनि वह आश्रम छोड़ कर चले गए ! जब आश्रम का परित्याग कर आगे बढ़े तो एक नदी के तट पर कौंडिन्य मुनि स्नान हेतु रुक गए !
कौंडिन्य मुनि स्नान कर रहे थे तभी कुछ स्त्रियों का झुण्ड उस नदी पर अन्नत पूजन करने को आया तो शीला उस झुण्ड में शामिल हो गई और उनसे उस व्रत के बारे में पूछा ! ये कौन सा व्रत हैं ? और इसे कैसे और क्यू करते हैं ?
तब वहाँ उपस्थित स्त्रियों ने उस व्रत की सारी महिमा का व्याख्यान किया !
उन्होंने कहा कि – यह अनंत चतुर्दशी का व्रत हैं ! और इस व्रत को करने से मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती हैं !
इस व्रत को करने के लिए नित्य कर्म आदि से निवृत होकर, स्नान कर कुछ विशेष प्रसाद में घरगा और अनरसे का विशेष भोजन तैयार किया जाता हैं !
आधा भोजन ब्रह्मण को दान में दिया जाता हैं! यह पूजा किसी नदी या सरोवर के किनारे होती हैं ! इसलिए हम सब यहाँ आये है!
दूभ या दूर्वा से नाग का आकर बनाया जाता हैं जिसे बांस के टोकरी में रखकर लाते हैं! और फिर इस नाग शेष अवतार की फूल और अगरबत्ती आदि से पूजा की जाती हैं!
दीप धुप से पूजन के बाद एक सिल्क का सूत्र भगवान को चढाते हैं जो की पूजा के बाद कलाई या भुजा में पहन लिया जाता हैं ! यह सूत्र ही अनंत सूत्र हैं !
इस अनंत के सूत्र में १४ गाँठे होती हैं, और इसे कुमकुम से रंग कर स्त्रियाँ दाहिने हाथ में और पुरुष बाएं हाथ में पहनते हैं !
यह अनंत सूत्र बाँधने और पूजन से सुख सौभाग्य में वृद्धी के साथ दैवीय वैभव की प्राप्ति भी होती हैं !
यह सब विधि पूजन सुनने के बाद शीला भी उस व्रत को करने का संकल्प ले वह व्रत करती हैं और अनंत सूत्र को अपने बाहु में बांध लेती हैं !
शीला ने भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत भगवान् का व्रत किया और अनंत सूत्र अपने बांये हाथ में अनंत सूत्र को बाँध लिया !
भगवान् अंनत की कृपा से शीला और कौंडिन्य के घर में सभी प्रकार की सुख – समृद्धि आ गई ! उनका जीवन सुखमय हो गया !
एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने यह क्या बांधा हैं? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया – जी, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। यह पूजन आरम्भ करने के बाद ही हमे यह वैभव और सुख प्राप्त हुआ हैं !
परन्तु परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्य ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा ! उस वैभव का कारण उन्होंने अपने परिश्रम और बुद्धिमता को बताया ! और अनन्त सूत्र को जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझा !
और दुर्भाग्यवश एक दिन कौंडिन्य मुनि ने क्रोध में आकर शीला के हाथ में बंधा अनंत सूत्र तोड़कर आग में फेंक दिया !
इससे उनकी सब धन और संपत्ति नष्ट हो गई और वे बहुत दुखी रहने लगे ! कौंडिन्य मुनि को अब भाष हो गया था कि वह सारा वैभव अनंत व्रत के प्रभाव से ही था !
उन्होंने तभी संकल्प किया कि वह अपने इस गलत कृत का प्रायश्चित करेंगे और तब तक ताप करेंगे जब तक कि भगवान अनंत स्वयं उन्हें दर्शन न दे दे !
एक दिन दुखी होकर कौंडिन्य मुनि वन में चले गए ! वन में उन्होंने देखा कि एक आम का वृक्ष पके हुए आम से भरा पीडीए हैं पर कोई भी उसके फल को नहीं खा रहा हैं ! तब पास आकर देखा तो उस पुरे वृक्ष पर कीड़े लगे थे ! उस वृक्ष से कौंडिन्य मुनि ने पूछा की आपने अनंत भगवान् को देखा है ?
लेकिन उत्तर ऋणात्मक ही मिला !
आगे जाने पर उन्होंने देखा कि एक गाय और उसके बछड़े को, आगे और जाने पर एक बैल मिला सब एक हरे भरे मैदान में थे पर कोई भी घास नहीं खा रहा था ! फिर आगे जाने पर दो नदियों को देखा जो एक दूसरे से एक किनारे पर मिल रही थी ! पर उसके पानी को भी कोई नहीं ले रहा था ! इस प्रकार सभी से उन लता, वृक्ष, जीव – जंतुओं, से अनंत भगवान का पता पूछने लगे ! पर सब ने मन कर दिया तब वह निराश हो अपने जीवन का अंत करने की सोच आगे बड़े तो दयानिधि भगवान् अनंत वृद्ध ब्राह्मण के रूप में कौंडिन्य मुनि को दर्शन दिया और अनन्त व्रत करने को कहा !
भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्यमुनिने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
शीला और कौंडिन्य मुनि ने अनंत व्रत को किया और वे पुनह सुख पूर्वक रहने लगे ! इस् व्रत को करने से मुक्ति और भुक्ति दोनों की उपलब्धि होती हैं !
अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।
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